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असंख्य परिवारांे की कल्पना में, एक गुट विशेष ने मान्यता प्रदान की जिसे हम समाज कहते है, पारिवारिक गठबंधनों से लेकर एक दायरे में जीवन जीने की कला सम्मिलित रूप से इन्हीं सामाजिक सोच से आती है पर यहा समाज अनादि काल से सृष्टि की संरचना करने वाली, परिवार को बढ़ानें वाली एवं उत्पत्ति भी मूलभूत तत्वों को संजोकर सारे कष्टों दुखों को झेलकर सदैव सृजन कार्य में लगी रहने वाली स्त्री समाज की घोर उपेक्षा की है आखिर क्यांे? हर बार मौकों पर सभी इस बात की चर्चा तो करते है पर कभी किसी ने स्त्री समाज पर अत्याचार , प्रताड़ना एवं दुराचार के लिए दोषी पायी गयी है। जबकि इसी पुरूष प्रधान की अहम भावना ही सदैव स्त्री ही जन्म देती है और माता कहलाती है। स्नेह देती है तो बहन कहलाती है, प्यार देती है भार्या कहलाती है मगर सब व्यर्थ है। आज अगर स्त्रियों को सम्मान देना है तो ना सिर्फ हम मूर्तियों की पूजा कहे बल्कि सही मामलों मंे अपने अंदर पुरूष प्रधान की अहम भाव को त्याग कर स्त्रियों का सम्मान करना होगा, तभी परिवार स्वस्थ रहेगा एवं समाज भी स्वस्थ रहेगा। कभी-कभी सामाजिक दायरे से घबराकर एवं पुरूषों के दबाव के तंत्र के चलते ना चाहते हुए भी खुद स्त्रियाँ ही स्त्रियों पर अत्याचार करती है जिसका नतीजा दहेज उत्पीड़न, मार-पीट, प्रताड़ना , भूखे रहना और यहाँ तक की हत्या भी देखने में आती है। आनर कीलिंग भी इसी का एक विकृत रूप ह। पारिवारिक कोर्ट, कचहरी में ऐसे तमाम मामले लंबित रहते है जिसमें 70 प्रतिशत दोषारोपण स्त्रियों पर ही लगाये जाते रहे है जब की इसे आपसी समझ से सुलझाये जा सकते है पर पहल तो करनी ही होगी। थानों से लेकर कोर्ट कचहरी के मध्य कम से कम 4 से 5 बार पारिवारिक कॉउन्सलिंग का प्रावधान हों और बाध्यकारी हो इसके बाद ही मा0 न्यायालय में बाद दायर करने की प्रावधान को ऐसी स्थिति में कहीं अधिक मामलें एक लम्बी एवं उबाऊ प्रक्रिया से बच जायेंगे और परिवार फिर से हरा भरा, खिलखिलाता नजर आने लगेगा यही समाज स्वस्थ समाज कहलाएगा। जिस देश में नारी का सम्मान हो वह देश कभी गरीब नहीं हो सकता है। विकसित राष्ट्र की यही पहचान है।
’’नारी स्वस्थ - देश समर्थ।’’